क्या याद करोगे? |
टूटता हैं, पूछता हैं जख्मी हृदय
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क्या याद करोगे?
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रीम्झीम बारिश में, भीगना हमारा
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पेडों की आडं में छीपना हमारा
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जाडें की धुप में चुपके से नीकल्ना
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खेतों की पग्दंदियों पर भी साथ साथ चलना.
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मौसम फिर आएंगे पर क्या याद करोगे?
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गन्ने के खेतों में धीरे से छुप जाना
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पत्तो से कटने पर मेरे हाथो को सहलाना
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इठलाना सरसों के फुल्लो के बीच
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कहना मेरा तुम्हे झटके से खींच
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"तुम पागल हो"
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थोड़े पागल हम भी हैं, पर क्या याद करोगे?
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मंदीर की घंटी से लटकना मेरा,
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गुस्से में चीजों का पटकना मेरा
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फीर तुम्हारा मुस्कुराना
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और मान जाना
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थोडा करीब आ कर, मुस्कुरा कर, गुदगुदा कर
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सीर हीला कर भाग जाना
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मुझे याद आती हैं पर क्या तुम याद करोगे?
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दो बूंद आंशु आँखों में भर कर
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तुम याद आओगी होली से कह कर
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नाटक से मुक्ती मैं भी तब पाया.
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जब तेरी आँखों में भी छलक आया
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रस बीर्हन का ऐसा ही होता हैं, पर क्या याद करोगे?
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